NEET पुनर्परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर अस्थायी रोक के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची कंपनी
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम परीक्षा सुरक्षा पर नई बहस

नई दिल्ली, 17 जून: लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म टेलीग्राम ने केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सरकार ने NEET-UG 2026 की पुनर्परीक्षा से पहले परीक्षा संबंधी धोखाधड़ी, फर्जी प्रश्नपत्रों के प्रसार और पेपर लीक से जुड़ी आशंकाओं को देखते हुए टेलीग्राम की सेवाओं पर अस्थायी रोक लगाने का आदेश जारी किया था। अब यह मामला डिजिटल अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और परीक्षा सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।
क्या है पूरा मामला?
केंद्र सरकार ने 16 जून को टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। यह प्रतिबंध 22 जून तक लागू रहने की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि NEET-UG पुनर्परीक्षा से पहले कई संगठित गिरोह टेलीग्राम चैनलों और समूहों का उपयोग करके छात्रों को कथित प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने, फर्जी दावे करने और आर्थिक ठगी करने में लगे हुए थे।
राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने सरकार को भेजी गई अपनी सिफारिश में कहा था कि परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने और अभ्यर्थियों को भ्रमित करने वाली सामग्री पर रोक लगाने के लिए कठोर कदम उठाना आवश्यक है। इसी के आधार पर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत कार्रवाई की।
दिल्ली हाईकोर्ट में टेलीग्राम की दलील
टेलीग्राम ने अपनी याचिका में कहा है कि पूरे प्लेटफ़ॉर्म को बंद करना एक अत्यधिक और असंगत कदम है। कंपनी का कहना है कि यदि कुछ चैनल या उपयोगकर्ता नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, तो उनके खिलाफ लक्षित कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन करोड़ों वैध उपयोगकर्ताओं को सेवा से वंचित करना उचित नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट में मामले का उल्लेख किए जाने पर अदालत ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी। अब न्यायालय यह तय करेगा कि सरकार का निर्णय सार्वजनिक हित में उचित था या यह डिजिटल अधिकारों पर अनावश्यक अंकुश माना जाएगा।
पावेल दुरोव का सरकार पर सवाल
टेलीग्राम के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) Pavel Durov ने सरकार के फैसले की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है। दुरोव का कहना है कि प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लगाने से पेपर लीक के वास्तविक दोषियों को कोई सजा नहीं मिलती, बल्कि भारत के करोड़ों सामान्य उपयोगकर्ता प्रभावित होते हैं। उन्होंने दावा किया कि इस तरह की रोक से समस्या की जड़ पर प्रहार नहीं होता और गलत गतिविधियां अन्य प्लेटफ़ॉर्म पर स्थानांतरित हो सकती हैं।
दुरोव ने यह भी कहा कि यदि परीक्षा सामग्री वास्तव में लीक हो रही है, तो इसकी जांच उन लोगों तक पहुंचनी चाहिए जो परीक्षा प्रणाली के भीतर से जानकारी बाहर निकाल रहे हैं, न कि केवल संचार मंचों को निशाना बनाया जाना चाहिए।
सरकार की चिंता: फर्जी पेपर और ऑनलाइन ठगी
सरकारी एजेंसियों का दावा है कि कई टेलीग्राम चैनल छात्रों से हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूलकर कथित प्रश्नपत्र बेचने का दावा कर रहे थे। जांच में ऐसे कई समूहों की पहचान की गई जो परीक्षा अभ्यर्थियों को गुमराह कर रहे थे। अधिकारियों का कहना है कि इस प्रकार की गतिविधियां न केवल परीक्षा की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि छात्रों का आर्थिक शोषण भी करती हैं।
इसके अलावा, टेलीग्राम के संदेश संपादन (Message Editing) फीचर के दुरुपयोग को लेकर भी चिंताएं सामने आईं। आरोप है कि कुछ लोगों ने संदेशों को बाद में संपादित कर ऐसा दिखाने की कोशिश की कि उनके पास परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र मौजूद था। इस कारण टेलीग्राम को भारत में सीमित अवधि के लिए यह सुविधा निष्क्रिय करने के निर्देश भी दिए गए।
विपक्ष और नागरिक अधिकार समूहों की प्रतिक्रिया
सरकार के फैसले को लेकर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि परीक्षा प्रबंधन की विफलताओं को छिपाने के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। उनका कहना है कि पेपर लीक की समस्या का समाधान प्रशासनिक सुधारों और सख्त जांच से होना चाहिए, न कि संचार माध्यमों पर रोक लगाकर।
वहीं, इंटरनेट स्वतंत्रता से जुड़े कुछ संगठनों और डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस कदम को अनुपातहीन बताते हुए चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि पूरे प्लेटफ़ॉर्म को बंद करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल संचार के अधिकार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
NEET विवाद की पृष्ठभूमि
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों से लगातार चर्चा में रहा है। चिकित्सा प्रवेश परीक्षा NEET से जुड़े विवादों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। लाखों छात्र और उनके परिवार इन परीक्षाओं पर अपने भविष्य के लिए निर्भर रहते हैं, इसलिए किसी भी तरह की गड़बड़ी व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया को जन्म देती है।
सरकार और NTA का कहना है कि पुनर्परीक्षा को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाए जा रहे हैं। दूसरी ओर, टेलीग्राम का दावा है कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कम कठोर विकल्प भी उपलब्ध थे।
आगे क्या?
अब सभी निगाहें दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला केवल टेलीग्राम के अस्थायी प्रतिबंध तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भविष्य में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों पर सरकारी नियंत्रण, ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय परीक्षाओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।
फिलहाल, NEET-UG पुनर्परीक्षा और उससे जुड़े सुरक्षा प्रबंधों के बीच यह मामला भारत में तकनीक, शिक्षा और नागरिक अधिकारों के जटिल संबंधों को उजागर करता है। आने वाले दिनों में अदालत का रुख यह तय करेगा कि परीक्षा सुरक्षा के नाम पर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की संवैधानिक सीमाएं क्या होंगी।





