धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा: जानें पूरा घटनाक्रम और प्रतिक्रियाएं
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा शनिवार को उस समय सामने आया जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना त्यागपत्र भेज दिया। यह फैसला पिछले करीब डेढ़ महीने से दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच आया है, जो NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक और CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली में गड़बड़ियों को लेकर शुरू हुआ था।
कैसे हुआ इस्तीफा
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने सोशल मीडिया मंच X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि जंतर-मंतर और देशभर में जो स्थिति बनी है, उसे देखते हुए वे नहीं चाहते कि कोई भी “देशविरोधी ताकतें” इस मौके का फायदा उठाएं और देश की एकता प्रभावित हो। उन्होंने यह भी कहा कि वे नहीं चाहते कि भारत के किसी भी एक छात्र का भविष्य कानूनी उलझनों में फंसे। प्रधान ने प्रधानमंत्री मोदी, अपने साथी मंत्रियों और शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों तथा कर्मचारियों का आभार जताते हुए कहा कि देश की सेवा करना उनके जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी।
गौरतलब है कि यह मांग पिछले कई हफ्तों से जंतर-मंतर पर डेरा डाले प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में से एक थी। ठीक उसी दिन जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया, कुछ ही घंटों बाद यह इस्तीफा सामने आया।Avengers Doomsday | Official Trailer :हर मार्वल फैन बेसब्री से कर रहा है इंतजार
विवाद की जड़: NEET पेपर लीक और छात्रों की मौतें
यह पूरा घटनाक्रम मई-जून 2026 में NEET-UG परीक्षा के आयोजन के कुछ दिनों बाद शुरू हुआ, जब खबरें आईं कि परीक्षा से पहले ही कुछ प्रश्न लीक हो गए थे और मार्किंग प्रक्रिया में भी अनियमितताएं पाई गईं। हर साल करीब 20 लाख छात्र इस परीक्षा में बैठते हैं, जबकि सीटें केवल लगभग 1.3 लाख ही हैं। सालों की कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा रद्द होने और भविष्य पर सवाल खड़े होने से निराश होकर कथित तौर पर कम से कम एक दर्जन छात्रों ने आत्महत्या कर ली, जो इस आंदोलन का सबसे संवेदनशील और केंद्रीय मुद्दा बन गया।
इसी असंतोष से जन्मी “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP), जो मूल रूप से मई 2026 में डिजिटल रणनीतिकार अभिजीत डिपके द्वारा शुरू किया गया एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया आंदोलन था, लेकिन देखते ही देखते यह एक बड़े जन आंदोलन में बदल गया। 6 जून से जंतर-मंतर पर शुरू हुए इस धरने में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन जैसे छात्र संगठन भी शामिल हो गए। 28 जून को समाजसेवी सोनम वांगचुक ने इस आंदोलन के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया। बाद में उन्हें प्रदर्शन स्थल से जबरन हटा दिया गया था।
20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा जत्था संसद की ओर कूच करते हुए देखा गया, जहां पुलिस की सख्ती और आंसू गैस के इस्तेमाल की खबरें भी सामने आईं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर राजनीतिक हलकों से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने कहा कि “यह इस्तीफा दबाव में आया है, न कि प्रधान की अपनी इच्छा या संवेदनशीलता से। यह राहुल गांधी के प्रयासों की वजह से संभव हो पाया है।” वहीं राजद सांसद मनोज झा ने इसे मोदी सरकार के लिए “पहला बड़ा झटका” करार देते हुए कहा कि यह हमारे युवाओं और छात्रों के संकल्प का नतीजा है।
CJP संस्थापक अभिजीत डिपके ने इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “बड़े-बड़े सिंहासन हिलेंगे”, जो आंदोलन के आगे और बड़ा असर डालने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस्तीफे से कुछ दिन पहले, 21 जुलाई को, धर्मेंद्र प्रधान ने खुद राहुल गांधी और कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि वे छात्रों को “राजनीतिक हथियार” की तरह इस्तेमाल कर संसद के मानसून सत्र में व्यवधान पैदा कर रहे हैं। भाजपा की ओर से इस मुद्दे पर आधिकारिक बयान अभी तक सीमित रहा है, हालांकि सरकार के भीतर कुछ सूत्रों ने पहले संकेत दिए थे कि इस्तीफे की मांग तुरंत स्वीकार नहीं की जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इस घटनाक्रम को अहम माना गया है। कतर स्थित समाचार माध्यम अल जज़ीरा ने इसे “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद पहली बड़ी रियायत” के तौर पर वर्णित किया।
सेलिब्रिटीज़ की प्रतिक्रिया
आंदोलन के दौरान बॉलीवुड और अन्य क्षेत्रों की कई जानी-मानी हस्तियों ने भी प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आवाज़ उठाई थी, खासकर 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद। दिग्गज अभिनेता प्रकाश राज खुद जंतर-मंतर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता जताते नजर आए थे। पंजाबी गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने भी पुलिस कार्रवाई की आलोचना करते हुए इंस्टाग्राम पर लिखा था कि “छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए” और अधिकारियों से उनकी बात सुनने की अपील की। अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने कहा कि प्रदर्शन के दृश्य उन्हें लंबे समय तक याद रहेंगे, जबकि अभिनेत्री-फिल्मकार नंदिता दास ने लिखा कि “रचनात्मक असहमति ही लोकतंत्र को जीवित रखती है” और वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी हैं।
आम जनता और छात्रों की प्रतिक्रिया
जंतर-मंतर पर मौजूद छात्रों और उनके परिवारों के लिए यह इस्तीफा हफ्तों की मेहनत और धैर्य का परिणाम माना जा रहा है। महीने भर से अधिक समय से डेरा डाले छात्रों, पेशेवरों और यहां तक कि छोटे बच्चों वाले परिवारों ने भी इस आंदोलन में हिस्सा लिया था। कई छात्रों ने इसे “अपनी आवाज़ की जीत” बताया, हालांकि आंदोलन से जुड़े संगठनों ने साफ किया है कि उनकी मांगें अभी पूरी तरह पूरी नहीं हुई हैं — प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने जैसी मांगें अब भी लंबित हैं।
आगे क्या
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भले ही आंदोलन की एक बड़ी मांग को पूरा करता हो, लेकिन प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि जब तक बाकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक धरना जारी रहेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नया शिक्षा मंत्री कौन होगा और क्या सरकार परीक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर कोई ठोस कदम उठाती है। यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति और शिक्षा नीति दोनों पर असर डाल सकता है।




