TMC Split Bengal Crisis: ममता पार्टी में 28 साल का सबसे बड़ा विभाजन, रिताब्रत बनर्जी बने विपक्ष के नेता
TMC में 28 साल में पहली बार ऐसा हुआ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो होने की कल्पना भी मुश्किल थी, वह हो गया। TMC Split (TMC टूट) ने पश्चिम बंगाल की राजनीति की बुनियाद हिला दी है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अपने 28 साल के इतिहास में पहली बार इतना बड़ा विभाजन देखा — जब 58 विद्रोही विधायकों ने पार्टी की विधायी शाखा पर कब्ज़ा कर लिया।

बुधवार को विद्रोही खेमे ने पार्टी से निष्कासित नेता रिताब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष रथीन्द्र बोस से मान्यता भी हासिल कर ली। यह Bengal Crisis (बंगाल संकट) केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है — यह एक ऐसे युग के अंत की शुरुआत हो सकती है जिसमें पश्चिम बंगाल पर सिर्फ एक व्यक्ति की इच्छाशक्ति का राज था।
“हम विधानसभा में बहुमत में हैं। संसदीय मानदंडों के अनुसार, हम पश्चिम बंगाल विधानसभा में असली और मुख्य विपक्ष हैं।”
— रिताब्रत बनर्जी, विद्रोही TMC खेमे के नेता, 3 जून 2026
कैसे शुरू हुई TMC में विद्रोह की आग?
इस TMC Split (TMC टूट) की जड़ें 4 मई को विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद उठी फुसफुसाहट में थीं। असली भूकंप 19 मई को आया जब रिताब्रत बनर्जी और एंटाली के विधायक संदीपन साहा ने फाल्टा के MLA जहाँगीर खान के खिलाफ सवाल उठाए — जिन्होंने पुनर्मतदान से सार्वजनिक रूप से खुद को अलग कर लिया था, लेकिन उन्हें निष्कासित नहीं किया गया था। यह सीधा निशाना था अभिषेक बनर्जी — यानी TMC के “क्राउन प्रिंस” — पर।
विद्रोहियों ने अपने अभियान को नाम दिया: “ऑपरेशन क्राउन प्रिंस”। यह संकेत स्पष्ट था। उनकी नाराज़गी ममता बनर्जी से नहीं, बल्कि उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की पार्टी पर बढ़ती पकड़ से है। रिताब्रत ने अपने बयान में ममता को “मुख्य सलाहकार” बनने की अपील भी की — जो एक रणनीतिक और सुलह की भाषा थी।
Anti-Defection Law (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत दो-तिहाई सीमा पार करना ज़रूरी था — और विद्रोही खेमे ने यह भी किया। 80 में से 58 या 59 विधायकों का समर्थन हासिल करके उन्होंने खुद को एक अलग विधायी दल के रूप में मान्यता माँगी।
- 4 मई 2026 को चुनाव हार के बाद TMC में असंतोष उभरा
- 58 विद्रोही MLAs ने Speaker को 59 समर्थकों की सूची सौंपी
- रिताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा पहले निष्कासित, फिर नेता चुने गए
- ममता की बैठक में केवल 8 विधायक, 6 सांसद पहुँचे
- विद्रोहियों ने खुद को “असली TMC” घोषित किया
- Speaker रथीन्द्र बोस ने विद्रोही खेमे को मान्यता दी
बंगाल की जनता और ग्रामीण TMC वोटर पर क्या होगा असर?
ग्राम सभा की दृष्टि से यह TMC टूट (Bengal Crisis) बहुत महत्वपूर्ण है। बंगाल के गाँवों में TMC का ज़मीनी नेटवर्क पंचायत स्तर से लेकर ज़िला स्तर तक फैला है। जब पार्टी में इतना बड़ा विभाजन होता है, तो स्थानीय नेताओं और ग्रामीण कार्यकर्ताओं को नहीं पता कि किस खेमे के साथ रहें।
ऐतिहासिक रूप से, ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि उनकी पार्टी उनके इर्द-गिर्द एक व्यक्तित्व पंथ की तरह खड़ी थी। कोई संस्थागत तंत्र नहीं, कोई आंतरिक लोकतंत्र नहीं। जब वह व्यक्तित्व ही विवादों में घिरा हो, तो पार्टी के पास कोई सुरक्षा-कवच नहीं बचता।
यह TMC Split (TMC टूट) शायद केवल विधानसभा की कहानी नहीं है। अगर यह टूट संसद तक पहुँची — जहाँ TMC के 29 सांसद हैं — तो राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मच सकती है।
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