गोबर से बायोगैस कैसे बनती है? पूरी प्रक्रिया आसान भाषा में
गोबर और जैविक कचरे से गैस बनने की प्रक्रिया को आसान भाषा में समझें—प्लांट के अंदर क्या होता है और गैस के साथ क्या निकलता है।
गांवों में पशुओं से मिलने वाला गोबर सिर्फ खेत में खाद के रूप में इस्तेमाल होने वाली चीज नहीं है। सही तरीके से इसका इस्तेमाल किया जाए तो इसी गोबर से बायोगैस बनाई जा सकती है। बायोगैस का इस्तेमाल खाना पकाने, रोशनी और कुछ ऊर्जा जरूरतों के लिए किया जा सकता है। इसके साथ प्लांट से निकलने वाली पची हुई स्लरी का इस्तेमाल जैविक खाद के रूप में भी किया जाता है।
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गोबर से बायोगैस कैसे बनती है, इसे समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि बायोगैस प्लांट के अंदर गोबर को खुले में सड़ाया नहीं जाता। इसे एक बंद टैंक में बिना ऑक्सीजन के वातावरण में जैविक तरीके से सड़ाया जाता है। इस प्रक्रिया को Anaerobic Digestion यानी अवायवीय अपघटन कहा जाता है।
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गोबर से बायोगैस बनाने की शुरुआत कैसे होती है?
सबसे पहले पशुओं से मिलने वाले ताजे गोबर को एक निश्चित मात्रा में पानी के साथ मिलाकर घोल या स्लरी तैयार की जाती है। इसके बाद इस मिश्रण को पाइप के जरिए बायोगैस प्लांट के डाइजेस्टर टैंक में भेजा जाता है।
प्लांट का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि रोज कितनी मात्रा में गोबर या दूसरा जैविक कच्चा माल उपलब्ध है। छोटे घरेलू प्लांट से लेकर बड़े सामुदायिक और व्यावसायिक प्लांट तक अलग-अलग क्षमता में बनाए जा सकते हैं। MNRE के अनुसार बायोगैस तकनीक का इस्तेमाल गोबर के अलावा दूसरे जैविक कचरे के लिए भी किया जा सकता है।
डाइजेस्टर के अंदर क्या होता है?
डाइजेस्टर बायोगैस प्लांट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह एक बंद टैंक होता है, जहां गोबर की स्लरी को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सूक्ष्मजीवों द्वारा तोड़ा जाता है।
इस प्रक्रिया में जैविक पदार्थ धीरे-धीरे टूटता है और उससे गैस पैदा होती है। इस गैस को बायोगैस कहा जाता है। MNRE के अनुसार बायोगैस में मुख्य रूप से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड होती है, जबकि थोड़ी मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया और नमी जैसे घटक भी हो सकते हैं।
यही मीथेन बायोगैस को ईंधन के रूप में उपयोगी बनाती है।
बायोगैस बनने के बाद गैस कहां जाती है?
डाइजेस्टर में बनने वाली गैस ऊपर की तरफ इकट्ठा होती है। इसके बाद पाइपलाइन के जरिए इसे गैस स्टोरेज या उपयोग वाली जगह तक पहुंचाया जाता है।
छोटे प्लांट में उचित व्यवस्था के साथ बायोगैस का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए किया जा सकता है। MNRE के अनुसार बायोगैस का उपयोग खाना पकाने, रोशनी और इंजन चलाने जैसी जरूरतों में किया जा सकता है।
हालांकि गैस को सीधे इस्तेमाल करने से पहले प्लांट की डिजाइन, गैस पाइपलाइन, सुरक्षा व्यवस्था और उपयोग किए जाने वाले उपकरण सही तरीके से लगाए जाना जरूरी है।
गोबर से गैस बनने के बाद बचता क्या है?
बायोगैस बनने के बाद पूरा गोबर गैस में नहीं बदल जाता। डाइजेस्टर से एक पचा हुआ पदार्थ बाहर निकलता है, जिसे आम तौर पर स्लरी या डाइजेस्टेड स्लरी कहा जाता है।
इस स्लरी में पोषक तत्व मौजूद रहते हैं और इसका इस्तेमाल जैविक खाद के रूप में किया जा सकता है। MNRE भी बायोगैस प्लांट से निकलने वाली डाइजेस्टेड स्लरी को जैविक समृद्ध खाद के स्रोत के रूप में बताता है।
इस तरह एक बायोगैस प्लांट से दो तरह के उपयोगी परिणाम मिल सकते हैं—एक तरफ ईंधन के रूप में गैस और दूसरी तरफ खेती के लिए जैविक खाद।
अच्छी बायोगैस के लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?
बायोगैस प्लांट की सफलता सिर्फ प्लांट लगाने पर निर्भर नहीं करती। नियमित रूप से पर्याप्त गोबर या अन्य उपयुक्त कच्चा माल मिलना जरूरी है। इसके अलावा पानी की उपलब्धता, सही मात्रा में स्लरी तैयार करना, डाइजेस्टर का उचित संचालन और पाइपलाइन में गैस का रिसाव न होना भी महत्वपूर्ण है।
छोटे बायोगैस प्लांट के लिए MNRE की जानकारी में पर्याप्त जमीन या जगह, गोबर अथवा अन्य फीडस्टॉक की उपलब्धता और नियमित पानी की जरूरत बताई गई है।
इसलिए केवल यह देखकर प्लांट लगाना उचित नहीं है कि गांव में बहुत गोबर उपलब्ध है। पहले यह देखना चाहिए कि रोजाना कितनी मात्रा में गोबर लगातार उपलब्ध रहेगा और उस हिसाब से किस क्षमता का प्लांट व्यावहारिक होगा।
बायोगैस और CBG में क्या अंतर है?
बायोगैस और CBG एक ही चीज नहीं हैं। बायोगैस डाइजेस्टर में जैविक पदार्थ के अपघटन से बनने वाली गैस है। इसमें मीथेन के साथ कार्बन डाइऑक्साइड और कुछ अन्य गैसें भी होती हैं।
CBG यानी Compressed Bio-Gas बनाने के लिए बायोगैस को आगे शुद्ध और अपग्रेड किया जाता है, जिससे मीथेन की मात्रा काफी बढ़ाई जाती है। इसके बाद इसे दबाव में संपीड़ित करके ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। MNRE के अनुसार बायोगैस को शुद्ध और अपग्रेड करके CBG बनाया जा सकता है।
इसलिए गांव में घर या छोटे स्तर पर लगाया गया सामान्य बायोगैस प्लांट और बड़े स्तर का CBG Plant अलग-अलग जरूरत और निवेश वाले प्रोजेक्ट हैं।
क्या गोबर से बायोगैस बनाना किसान के लिए फायदेमंद हो सकता है?
यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जिन परिवारों या संस्थानों के पास लगातार गोबर उपलब्ध है, उनके लिए बायोगैस खाना पकाने जैसी जरूरतों में उपयोगी हो सकती है। इसके अलावा प्लांट से निकलने वाली स्लरी का इस्तेमाल खाद के रूप में किया जा सकता है।
सरकारी योजनाओं के तहत भी बायोगैस को बढ़ावा दिया गया है। GOBARdhan पहल का उद्देश्य गोबर और दूसरे जैविक कचरे को बायोगैस, बायो-स्लरी और अन्य उपयोगी उत्पादों में बदलना है।
हालांकि किसी सरकारी सहायता या सब्सिडी को सभी लोगों के लिए अपने आप उपलब्ध मानना सही नहीं है। पात्रता, योजना की अवधि, राज्य की व्यवस्था और उपलब्ध लक्ष्य के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं।
बायोगैस प्लांट लगाने से पहले क्या देखें?
प्लांट लगाने से पहले रोजाना उपलब्ध गोबर की मात्रा, पानी की उपलब्धता, जमीन, प्लांट की क्षमता, तकनीक, निर्माण लागत और गैस के इस्तेमाल की व्यवस्था को समझना चाहिए। साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि प्लांट का रखरखाव कौन करेगा।
सरकारी सहायता के लिए आवेदन करने वालों को संबंधित आधिकारिक पोर्टल और राज्य की कार्यान्वयन एजेंसी की मौजूदा जानकारी जरूर देखनी चाहिए। MNRE का आधिकारिक बायोगैस पोर्टल आवेदन और योजना से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराता है।
निष्कर्ष
गोबर से बायोगैस कैसे बनती है, इसका सरल जवाब है—गोबर और पानी से स्लरी तैयार की जाती है, इसे बंद डाइजेस्टर में बिना ऑक्सीजन के रखा जाता है और सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थ को तोड़कर मीथेन वाली बायोगैस बनाते हैं। इसके बाद गैस का उपयोग उचित उपकरणों के जरिए किया जा सकता है और बची हुई स्लरी को जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
अगर आप बायोगैस प्लांट लगाने की योजना बना रहे हैं, तो केवल गैस बनने की प्रक्रिया समझना पर्याप्त नहीं है। प्लांट का सही आकार, लगातार गोबर की उपलब्धता, पानी, तकनीक, लागत, रखरखाव और स्थानीय नियमों की जानकारी लेना भी जरूरी है।
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Disclaimer
यह लेख केवल सामान्य और सूचनात्मक उद्देश्य के लिए है। बायोगैस प्लांट की लागत, सरकारी सहायता, पात्रता, आवेदन प्रक्रिया, योजना की अवधि और अन्य नियम समय-समय पर बदल सकते हैं। किसी भी आवेदन, निवेश या प्लांट की स्थापना से पहले संबंधित सरकारी आधिकारिक वेबसाइट, पोर्टल और राज्य की संबंधित विभागीय एजेंसी से वर्तमान नियम, शर्तें और उपलब्ध सहायता की जानकारी जरूर जांचें। सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी को ही अंतिम और वर्तमान आधार मानें।