बुंदेलखंड के जालौन जिले के कालपी तहसील क्षेत्र के छोटे से गांव चमारी में हाल ही में ‘माता प्रसाद पुस्तकालय’ का उद्घाटन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह ग्रामीण सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम था। पत्रकार सौरभ द्विवेदी और उनकी पत्नी गुंजन सांगवान की पहल पर स्थापित यह पुस्तकालय शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक परिवर्तन की नई उम्मीद लेकर आया है।
गांव से जुड़ाव और समाज के प्रति जिम्मेदारी
अक्सर देखा जाता है कि शहरों में सफलता हासिल करने के बाद लोग अपने गांवों से दूरी बना लेते हैं। लेकिन सौरभ द्विवेदी ने इसके विपरीत अपने पैतृक गांव को ही अपनी सामाजिक पहल का केंद्र बनाया। उन्होंने यह साबित किया कि अगर शिक्षित और सफल लोग अपने गांवों की ओर लौटें, तो वहां विकास और बदलाव की नई कहानी लिखी जा सकती है।
कार्यक्रम के दौरान सौरभ द्विवेदी ने एक बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि वे और उनकी पत्नी अपनी पूरी चल और अचल संपत्ति ‘देस राग’ संस्था के माध्यम से बुंदेलखंड में 100 पुस्तकालयों के निर्माण के लिए समर्पित करेंगे। यह घोषणा केवल एक संकल्प नहीं बल्कि ग्रामीण शिक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक दूरदर्शी योजना है।
पुस्तकालय: केवल किताबों का घर नहीं
कार्यक्रम में मौजूद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता Kailash Satyarthi ने कहा कि पुस्तकालय केवल किताबों का भवन नहीं होता, बल्कि यह समाज में ज्ञान की चिंगारी जगाने का माध्यम है। उनके अनुसार अगर बुंदेलखंड में ऐसे 100 पुस्तकालय बन जाते हैं तो यह एक बड़े शैक्षिक आंदोलन का रूप ले सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक समाज में एक भी बच्चा बाल श्रम करने को मजबूर है, तब तक विकास अधूरा है।
गांवों में आधुनिक शिक्षा का माहौल
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री Brajesh Pathak ने कहा कि अब समय आ गया है कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी आधुनिक पुस्तकालय स्थापित किए जाएं। इससे ग्रामीण युवाओं को आईएएस और आईपीएस जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहतर माहौल मिलेगा।
किताबों की दुनिया और सांस्कृतिक चेतना
प्रसिद्ध कवि Kumar Vishwas ने अपने संबोधन में कहा कि आज का युवा तेजी से अपनी सांस्कृतिक जड़ों और आध्यात्मिक मूल्यों की ओर लौट रहा है। उनके अनुसार किताबें कल्पना और विचारों की दुनिया बनाती हैं, जो डिजिटल माध्यम पूरी तरह नहीं कर सकता। ऐसे समय में गांव में पुस्तकालय की स्थापना एक बड़ी सांस्कृतिक पहल है।
शिक्षा और कहानियों की ताकत
अभिनेत्री Sonali Bendre ने कहा कि किताबें और कहानियां शिक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जहां स्कूल और बड़े संस्थान बनने में समय लगता है, वहीं पुस्तकालय किसी भी पीढ़ी के लिए तुरंत ज्ञान का द्वार खोल देते हैं।
संवाद और लोकतांत्रिक सोच
राज्यसभा के उपसभापति Harivansh Narayan Singh ने कहा कि भारत का संविधान संवाद और सहमति की भावना से बना है। उनके अनुसार एक युवा पत्रकार द्वारा गांव में पुस्तकालय की स्थापना करना समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है।
ज्ञान के उत्सव में भागीदारी
कॉमेडियन Zakir Khan ने कहा कि आमतौर पर लोगों को मनोरंजन कार्यक्रमों में बुलाया जाता है, लेकिन पुस्तकालय के उद्घाटन में बुलाया जाना गर्व की बात है। यह समाज में सकारात्मक बदलाव का संकेत है।
वहीं शिक्षाविद Vikas Divyakirti ने कहा कि वे यहां पुस्तकालय का मॉडल देखने आए हैं। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे संसाधनों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

पुस्तकालय की खास विशेषताए
‘माता प्रसाद पुस्तकालय’ केवल किताबों तक सीमित नहीं है। यहां शिक्षा, साहित्य और ज्ञान से जुड़ी सैकड़ों किताबों का संग्रह है। इसके ऊपर एक ऑडिटोरियम भी बनाया गया है, जहां लेखक, कलाकार और विचारक आकर बच्चों के साथ संवाद कर सकेंगे।
इस पहल का सबसे अनोखा हिस्सा मोबाइल लाइब्रेरी ट्रक है, जो आसपास के गांवों में घूमकर बच्चों तक 400–500 किताबें पहुंचाएगा। इससे उन बच्चों को भी पढ़ने का अवसर मिलेगा जो पुस्तकालय तक नहीं पहुंच सकते।
ग्राम पंचायत की कहानी: प्राचीन काल से आज तक
ग्रामीण सशक्तिकरण की दिशा में एक मॉडल
‘माता प्रसाद पुस्तकालय’ केवल एक इमारत नहीं बल्कि एक विचार है—यह विचार कि शिक्षा और ज्ञान के माध्यम से गांवों को सशक्त बनाया जा सकता है। सौरभ द्विवेदी की यह पहल दिखाती है कि अगर समाज के सक्षम लोग अपने गांवों के विकास में योगदान दें, तो ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकती है।
बुंदेलखंड की धरती से शुरू हुई यह पहल आने वाले समय में शिक्षा और सामाजिक बदलाव के एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है।
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